है जुस्तजू {तलाश} के खूब से खुबतर कहाँ ?
अब ठहरती है देखिये जाकर नज़र कहाँ ?
इक उम्र चाहिए की गंवारा हो नशे- इश्क {इश्क का नशा},
रखी है आज लज्जत-ए- जख्म-ए-जिगर {दिल पर चोंट खाने का मज़ा} कहाँ ?
हम जिस पे मर मिटे हैं वो बात ही कुछ और है,
आलम में तुझसे लाख सही तू मगर कहाँ ?
होती नही कबूल दुआ तर्क-ए-इश्क {इश्क को छोड़ने} की ,
दिल चाहता ही नही तो दुआ में असर कहाँ ?
'गालिब' निशात-ए-नगमों {खुशी के नगमे} में ढूढ़ते हो अब,
आए हो सुबह के "वक़्त" रहे रात भर कहाँ ?

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